युवा मन चिंतन करे : “जीवन क्या है”

0
155

मुक़्ता नाम की पत्रिका में
मेरे द्वारा लिखित एक विशेष लेख ” युवा मन चिंतन करे : जीवन क्या है ? ”
जो अक्टोबर (प्रथम) 1993 के अंक में छपा था ।

जीवन क्या है
मुक्ता पत्रिका : 1993

किशोरावस्था की दहलीज पर अपने कदम रखते ही प्रत्येक नवयुवक एक नए जोश और नई चेतना का अनुभव करता हैं। उस नवजवान की रगों में तूफानी गति आ जाती हैं। मन मे
‘ कुछ विशेष ‘ कर डालने या कर दिखाने की एक हूक सी पैदा हो जाती हैं। उसकी आंखें खूबसूरत सुनहरे सपनों का बसेरा बन जाती हैं। वह अपनी उन्ही इच्छाओं का कायल बन जाता हैं। उस नवयुवक को ऐसा महसूस होता है कि बस, अब अपने लक्ष्य को प्राप्त करना ही उसके जीवन का एकमात्र उद्देश्य हैं।
वह सोचता है कि जब तक इन सपनों को अपने आप मे समेट नहीं लेगा तब तक चैन की नींद तो छोड़िए चैन और सुकून की सांस तक नहीं लेगा। उसके श्वास की प्रक्रिया तीव्र हो जाती हैं। वह जीवन के इतिहास पर लिखी सभी सूक्तियों को अपने मे ढालने की कोशिश करता हैं।

जीवन क्या हैं ? यह प्रश्न अपने आप मे सभी युवकों को अधूरा और डरावना लगता हैं। बड़े बड़े लेखकों ने, बड़े बड़े कवियों ने , बड़े बड़े ज्ञानी मनीषियों ने अपनी रचनाओं या कृतियों के माध्यम से जीवन को कई प्रकार की उपमाओं से सुशोभित किया हैं।
कई लोगों ने तो जीवन को उसकी सही परिभाषा से दूर,एक कठोर चट्टान पर ला कर खड़ा कर दिया हैं।
किसी ने जीवन जीने को जंग जीतना कहा हैं क्योंकि उनके लिए जीवन एक जंग हैं।
किसी ने जीवन को संगीत की उपमा दी हैं। ऐसे लोगों के लिए जीवन सा रे गा मा की तरुन्नम हैं। कई लोग तो जीवन को महज पागलपन कहते है तो किसी ने जीवन को पुरुषार्थ सिद्ध करने की कला की संज्ञा देकर जीवन को गौरान्वित किया हैं।
सभी की नज़रों में जीवन की अपनी अपनी परिभाषा है,
अपनी अपनी समझ है,
अपनी अपनी पहचान हैं।
परन्तु सच्चाई यही है कि जीवन जीना उतना आसान नहीं है जितना आसानी से हम जीवन को आसान समझते हैं।

जीवन अमूल्य हैं।
दुनिया के किसी भी बाजार में इसका मोल भाव नहीं किया जा सकता हैं। क्या जन्म से मृत्यु के मध्य की अवधि ही जीवन कहलाती हैं ? क्या उत्पत्ति और विनाश की मध्यावस्था ही जीवन है ? यह एक महान सत्य है कि मृत्यु जीवन का अंतिम सत्य हैं। यह भी एक महान आश्चर्य हैं कि अंत ही आरम्भ हैं।

जीवन को सार्थक बनाने के लिए अर्थात एक उद्देश्यपूर्ण जिंदगी जीने के लिए मनुष्य के सामने एक निश्चित लक्ष्य होना चाहिए। यदि गजराज बिना सूंड का हो, नागराज नागमणि से निर्धन हो, विशाल सागर में लहरों का उफान न हो, अग्नि में तपिश न हो, मोर सुंदर न हो, तो इन सब के जीवन मे न कोई गर्व होता है न कोई इनका गौरव करता हैं।।। इन सब के समान ही लक्ष्यहीन मानव अपने जीवन पर गर्व नहीं कर सकता हैं। मानव जीवन मे लक्ष्य का होना उतना ही आवश्यक है जितना आकर्षक एवं सुगम संगीत में लय,
ताल, आरोह एवं अवरोह की आवश्यकता होती हैं।

लेखक: राजेश दुबेय

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here