Struggler (उपन्यास) 14 : समय और भाग्य

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समय और भाग्य की लड़ाई में अक्सर आदमी की हालत चूँ चूँ के मुरब्बे की तरह हो जाती है। विकास के दौर में असहनीय पीड़ा सहनी पड़ती है और विकसित होने के बाद असीम आनंद की प्राप्ति भी भोगने को मिलती हैं । पतझड़ के बाद वसंत आता है, जेठ के बाद आषाढ़…………रात के बाद दिन आता है और दुख के बाद सुख……….जड़ के बाद तना, बौर के बाद फल, दूध से दही और दर्द से आंसू……….. प्रसव के बाद ममता वात्सल्य…………………. धूप-छाव के कई पड़ाव से गुजरने के बाद साँझ की गोधूलि में
” क्या खोया क्या पाया ”
का विचार करे तो कुछ लोगो को लगता है कि बहुत कुछ खोया, बहुत कुछ पाया और कुछ लोग महसूस करते है कि न कुछ खोया न कुछ पाया। कुछ ऐसा भी है जिनका मानना है कि जब कुछ खोकर कुछ पाया तो वह प्राप्ति भी किस अर्थ की ? शाश्वत सत्य का कथन है कि पाने और खोने के अनुपात में माथापच्ची न करते हुए संतोष करने में ही समझदारी है। दुर्भाग्यवश,ऐसे समझदारों की संख्या बहुत कम है। खास कर हमारी बॉलीवुड में मृगतृष्णा इतनी अधिक हैं कि कोई इस तरह का समझदार बनना ही नही चाहता भले ही वह पैदाइशी समझदार हो या किसी समझदार खानदान से ताल्लुक रखता हो !!!
सन्तोषम परम सुखम…………

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