Film making

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What is FILM MAKING ? फिल्मों का निर्माण कैसे होता हैं ? Film making एक लंबा प्रोसेस है । इसकी शुरूवात एक कहानी से होती है । 

एक फिल्म बनाने के लिए सबसे पहले एक अच्छे कहानी की तलाश होती है। एक ऐसी कहानी जो बॉक्स आफिस पर धमाल मचाने की कुव्वत रखती हो। एक राइटर जब किसी कहानी को लिखता है , तो अपना पूरा दिमाग एक धांसू ताना बाना बुनने में लगा देता है। अपनी कल्पनाओं की उड़ान को कागज पर उतारने के बाद लेखक महोदय अपनी जानदार शानदार कहानी किसी अच्छे डायरेक्टर या प्रोड्यूसर को सुनाते है।
अगर डायरेक्टर और प्रोड्यूसर को कहानी अच्छी लगती है, तो उस कहानी पर फिल्म बनाने का निर्णय लिया जाता है। डायरेक्टर उस राइटर के साथ बैठकर कहानी को और भी अच्छे तरीके से अपनी सोच के हिसाब से सजाता है और तब तक कहानी पर काम चलता रहता है, जब तक डायरेक्टर उस कहानी से पूरी तरह सन्तुष्ट न हो जाये। क्योंकि फिल्म के हिट फ्लॉप का सेहरा डायरेक्टर के सिर पर बांधा जाता है जिसे CAPTION OF THE SHIP कहा जाता है।

FILM MAKING divided in Three Parts

फिल्म निर्माण की प्रक्रिया तीन विभागों में विभाजित हैं।

1) PRE PRODUCTION

एक बार कहानी फाइनल हो जाती है, तो उसके बाद PRE PRODUCTION के सारे काम शुरू होते है।

प्री प्रोडक्शन में सबसे पहले कहानी की फाइनल डायलाग स्क्रिप्टिंग होती है,

चार छह अच्छे गानों के लिए अच्छे गीतकार की खोज शुरू होती हैं।
म्यूजिक डायरेक्टर उन सभी गीतों को प्रोग्राम करके, कंपोज़ करके अच्छे सिंगर से गाना गवां कर फाइनल मिक्सिंग करके डायरेक्टर प्रोड्यूसर को गीत सौप देता हैं।

एक अच्छे कोरियोग्राफर को लिया जाता है जो की उस गाने को बहुत ही बढ़िया तरीके से शूट कर सके। बड़ी खूबसूरती से choreograph कर सकें। फिर लोकेशन ढूंढा जाता है जिसे फिल्मी जुबान में लोकेशन रेकी कहा जाता हैं।
इसी दौरान कास्टिंग डायरेक्टर कहानी के हिसाब से अच्छे से अच्छे आर्टिस्टों की कास्टिंग करता है। फिर प्रोडूक्शन टीम शूटिंग के schedule के हिसाब से सारे आर्टिस्टों की डेट्स लेता है कि किस दिन , कौन से जगह, कितने अर्टिसटो की जरूरत है। schedule सेट होने के बाद प्रोडक्शन टीम देखती है कि किन किन प्रॉपर्टी, कॉस्ट्यूम्स की शूटिंग के दौरान जरूरत है, कितने कैमरों की जरूरत है,कितने लाइट्स की जरूरत है,कितने स्पॉट बॉय की जरूरत है,कितने असिस्टेंट डायरेक्टर की जरूरत है,
कितने असिस्टेंट कैमरामैन की जरूरत है,
कितने बजे की शिफ्ट होगी, शूटिंग के दौरान प्रोडक्शन टीम वाले ही सारा जिम्मेदारी का काम संभालते है।

2) SHOOTING

फिर धूमधाम से शूटिंग शुरू होती है। शूटिंग के दौरान बहुत से लोगो का डिपार्टमेंट होता है जो अपने काम को सही ढंग से करता हैं। सभी डिपार्टमेंट एक दूसरे के ऊपर निर्भर होते है इसलिए किसी एक कि गलती या लापरवाही पूरी यूनिट को भुगतनी पड़ती हैं।
सबसे जिम्मेदार डिपार्टमेंट स्पॉट बॉय लोगों का होता है जिनके बिना शूटिंग सम्भव ही नहीं हो सकती।
स्पॉट बॉय यूनिट के सभी मेम्बरों की सेवा करता है, सभी को पानी से लेकर खाना खिलाने तक का काम स्पॉट बॉय का होता है, सेटिंग डिपार्टमेंट जो कि लोकेशन के कोने कोने को बड़ी सुंदरता से सजाते है, लाइट मैन डिपार्टमेंट जो कि जगह जगह बड़ी बड़ी लाइटो को जलाकर लोकेशन की सुंदरता में, खूबसूरत में चार चांद लगा देते है।
अब बारी आती है आर्ट डायरेक्टर की जो डायरेक्टर के अनुमति से सारे प्रॉप्स का इस्तेमाल करके लोकेशन को सजाता है।
डायरेक्टर के पांच छः असिस्टेंट होते है जिन्हें असिस्टेंट डायरेक्टर कहा जाता है,
शूटिंग के दौरान असिस्टेंट डायरेक्टर की बहुत अहम भूमिका होती है।
असिस्टेंट डायरेक्टर के बहुत से डिपार्टमेंट होते है। आर्टिस्टों को सीन्स समझाना,
कॉस्ट्यूम देखना,
टी.सी.आर. लिखना,
क्लेप मारना,
आर्टिसटो को सेट पर बुलाना,
और भी बहुत सारा काम असिस्टेंट डायरेक्टर का ही होता है। एक डायरेक्टर के बहुत से अस्सिस्टेंट होते है,जो इन सारे कामो की देखभाल बड़ी बखुबी से करते है। डायरेक्टर के एक या दो एसोसिएट्स भी होते है जिन्हें एसोसिएट डायरेक्टर कहा जाता है,डायरेक्टर के सारे कामों की देखभाल एसोसिएट डायरेक्टर करते है।
जब आप फिल्म को स्क्रीन पर या tv पर देखते है तो यह कमाल बिना कैमरे के या कैमरामैन के बिना नहीं हो सकता हैं। कैमरामैन डायरेक्टर की आँख होता है,डायरेक्टर जो अपनी आंखों से देखना चाहता है, वो चीज़ कैमरामैन अपने कैमरा से दर्शाता है। कैमरामैन के भी सात से आठ असिस्टेंट होते है जिनका काम होता है कैमरा सेटअप करना, लेंस चेंज करना, ट्राली चलाना,मेमरी चिप बदलना वगैरह वगैरह वगैरह ।
अब बारी आती है मेकअप मैन और ड्रेस मैन डिपार्टमेंट की जो कि आर्टिस्ट को उसके रोल के हिसाब से बहुत ही बढ़िया अंदाज़ में सजाते है। उसके बाद आते है आर्टिस्ट जो कि सेट अपने धुंआधार परफॉरमेंस से सबको खुश कर देते है। सबके चेहरे पर मुस्कान ला देते है कि ये पिक्चर जरूर कमाल करेगी।

3) POST PRODUCTION

शूटिंग हो जाने के बाद सारे POST PRODUCTION के काम शूरु हो जाते है। POST PRODUCTION में डबिंग होती है। डबींग का मतलब होता है आर्टिस्ट लोग अपने डायलॉग्स को क्लियर तरीके से बोलते है। प्री प्रोडक्शन में EDITING होती है,एडिटर की FILM MAKING में बहुत बडी भूमिका होती है। एडिटर फिल्म में जितना हो सके उतना रस भर देता है। एडिटिंग से लेकर मिक्सिंग तक कि सारी प्रक्रियाओं के पूरे होने के बाद फिल्म पूरी तरह तैयार हो हो जाती है। अब इस फिल्म को सेंसर में भेजा जाता है,अगर फिल्म में किसी भी गलत शब्दो का प्रयोग हो , या गलत चीज़ दिखाई जा रही हो, तो उसपे सेंसर बोर्ड कट्स लगाता है। जितने कट्स है उसे एडिट करना पड़ता है। और अगर कट्स न हो , तो आगे के काम शुरू हो जाते है, जैसे कि प्रोमोशन्स, डिस्ट्रीब्यूटर ढूंढना पड़ता है। इन सारे कामो के बाद फिल्म को देश भर के पर्दो पे उतारा जाता है। अब ये फिल्मकी किस्मत, प्रोड्यूसर की किस्मत, डायरेक्टर की किस्मत, सिंगर की किस्मत,और फिल्म   में काम करने वाले अन्य लोगो के किस्मत पर आधारित होती है, कि यह फिल्म जनता द्वारा पसंद की जाएगी या नही, ये फिल्म बॉक्स आफीस पर अपना जादू चला पाएगी या नही, ये फिल्म अपना इतिहास लिख पाएगी या नही। यह सब किस्मत का खेल है, यह लोग एक दिन में रोडपति से करोड़पति बन जाते है ।

film making या कहे फिल्म बनने में समय लगता है । जैसे जैसे फिल्म आगे बढ़ती है धीरे धीरे लोग जुड़ते जाते है । इस तरह एक फिल्म बनती है । NSD और FTII जैसे संस्थानों में FILM MAKING के courses और APPRECIATION COURSES होते है |

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