Struggler (उपन्यास) 13 : सुख / दुःख

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सुख की आयु बहुत कम होती है और दुख की आयु बहुत लंबी………..ऐसा हमे प्रतीत होता है लेकिन यथार्थ में ऐसा होता नहीं हैं। केवल हमारी अनुभूति उस सुख दुख के प्रति लम्बी छोटी बड़ी होती हैं। सुख दुःख की अनुभूति ही आंखों में चमक लाती है या आंसू बहाती हैं। दुःख का एक पल सुख के सौ वर्षों के बराबर होता हैं। समय परिवर्तनशील हैं। दुःख के दिन भी धीरे धीरे एक न एक एक करके गुजर जाते हैं।सांझ होने पर जब सूरज की इतनी बिसात नहीं होती कि वह अपने आपको अस्त होने से बचा सके तो सुख के उजाले का अनुकूल समय आने पर दुःख दर्द का अंधियारा अपने आप छट जाएगा। सुख दुःख दोनों एक सिक्के के दो पहलू है ।

Struggler novel

ऐसे ही मुम्बई में फिल्मी स्ट्रगल करनेवाले स्ट्रगलेरों की जिंदगी में भी दुःख का अंधियारा छटने लगता हैं जब धीरे धीरे उन्हें थोड़ा बहुत काम मिलने लगता है, थोड़ी बहुत उनकी पहचान बनने लगती है और एक ऐसा भी वक़्त आता है कि धीरे धीरे उनके प्रशंषकों की संख्या बढ़ने लगती हैं ।

दुःख केवल पीड़ा ही नहीं देता बल्कि जीवन के मूल्यों को समझाता भी हैं। सिद्धांत एवं आदर्शों को दुनिया के मन मस्तिष्क में मथता रहता हैं। कुछ नए संकल्पों के साथ आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है और यही प्रेरणा एक स्ट्रगलर के खाली शून्य मन मे हौसलों का पहाड़ खड़े करने का काम करती हैं। इस बात को भी ध्यान में रखना चाहिए कि …………ग्लैमर के क्षेत्र में किस्मत ही सब कुछ होती हैं। जो जीत गया…….वही सिकन्दर……बाकी बंदर।।।

मनुष्य के अंतर्मन में किसी भी प्रकार की इच्छा जागृत हो, चाहे वह राजसी हो, तामसी हो या सात्विक। उस इच्छा की प्राप्ति के लिए वह तन मन धन से प्रयत्नशील हो जाता हैं। प्रयत्न करने पर साधारणतः सफल नहीं हो पाता तो वह कई तरह के हथकंडे अपनाना शुरू कर देता हैं………साम,दाम,दंड,भेद।।।

नीतिगत प्रयासों के बावजूद निराश होने पर वह अपने मन को समझाता है कि यह मंजिल मेरे भाग्य में नहीं है तो व्यर्थ में और  प्रयास क्यों करूँ, और समय क्यों गवाऊँ !!! खट्टे अंगूर वाली लोमड़ी की तरह सोचने पर वह परम संतोषी हो जाता हैं………सन्तोषम परम् सुखम।।।सच से समझौता करके सीधा सादा सुखमय जीवन व्यतीत करने में ही वह अपनी भलाई समझता है…………..ऐसी समझ हर स्ट्रगलर के जीवन मे कभी न कभी आती ही हैं। परन्तु यदि वह दुर्भाग्यवश अपने आपको समझाने बुझाने या फुसलाने में असफल रहा या उसने महसूस किया कि अगर थोड़ी और मेहनत कर ली जाए……थोड़ी और प्रतीक्षा कर ली जाए……तो बात जरूर बनेगी ……..तो समझो कि वह धुरंधर स्ट्रगलर या तो ताज ओ तख्त का शहेंशाह बनेगा या तो शहीद हो जाएगा। लेकिन अफसोस कि लोग उसकी ऐसी शहादत को ” कुत्ते से भी बदतर मौत ” का खिताब देकर खिल्ली उड़ाएंगे।

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Read last part :-

Struggler (उपन्यास) 11 : इंसान
Struggler (उपन्यास) 10 – Dream city

 

 

3 COMMENTS

  1. बहुत ही सुंदर ढंग से इस उपन्यास के माध्यम से आपने हम strugglers की मारगदर्शन किए तथा हमें डूबने से बचाए हमारी जिन्दगी अब एक नयी मोड़ लेने वाली थी फ़िल्म की दुनिया chhodkar हम अब अपने घर की रुख लेने वाले थे परंतु आपके इस मारगदर्शन ने हमारे अंदर फिर से जोश, उम्मीद तथा struggle की chhamata को ओर बढ़ा दिया है ओर हमारे अंदर के कला को फिर से जीवंत कर दिया है हमारे मनोबल को और बढ़ा दिया है यदि मुझे समय पर यह मारगदर्शन नहीं मिलता तो शायद मैं गाँव मे जाकर खेती करने में जुट जाता बहुत बहुत धन्यवाद मैं आपको प्रणाम करता हूँ

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