Struggler (उपन्यास) 15 : मन के हारे हार है , मन के जीते जीत है ।

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वृद्ध व्यक्ति जो अपने जिंदगी की लंबी पारी खेल चुका है,
वृद्धावस्था में शारीरिक एवं मानसिक स्तर पर कमजोर होने के बाद,
वह अपने शेष बचे जीवन के बारे में कम लेकिन बीते हुये कल के बारे में अधिक विचारमंथन करता है। बाल अवस्था मे उसके आंखों में कितने सुनहरे स्वप्न थे, तरुणाई के दिनों में वह किन-किन समस्यायों से उलझा था, धर्मसंकट के क्षणों में उसके सहनशीलता की क्या भूमिका रही, बीते हुए दिनों की खोह में कितना कुछ खोया- कितना कुछ पाया, क्या क्या उपलब्धियां रही, स्वयं पर गर्व और जीवन पर गौरव करने योग्य है अथवा नही,- ऐसे न जाने कितने आत्मिक और बौद्धिक प्रश्न होंगे जो वृध्द वयक्ति के सुने मन मे गूँजते रहते है। यह कैसी विचित्र विडंबना है कि एक समय वह था जब एक नवजवान अपने भावी दिनों के बारे में सोचता है और एक समय यह है कि जब वही नवजवान,कल का नवजवान,आज तन और मन से बूढा होकर अपने अतीत की यादों में डूबता उतराता है।

स्ट्रगलर

ऐसे ही समय का बहाव भी मुम्बई के अधिकांशतः स्ट्रुगलरों को स्वप्न के साहिल से अलग थलग कर देता हैं या बहुत दूर कही और बहा ले जाता हैं। एक बड़ी अच्छी सुंदर पंक्ति है कि मन के हारे हार है मन के जीते जीत। जब तक कोई स्ट्रगलर मन से कमजोर नहीं हो जाता तब तक उसे कोई हरा नहीं सकता !!! लेकिन यदि वह स्ट्रगलर मन से हार जाए तो दुनिया की कोई ताकत उसे जीता नहीं सकती !!! अक्सर मन से वही हार मानते है जिनकी आंखों में दूसरे स्वप्न उगने लगते हैं। सावधान !!!!

यदि एक बार मन स्ट्रगल करने से डर गया या ऊब गया और बॉलीवुड के अलावा कही और सेट होने की बात दिमाग मे आई तो समझो… ‘अलविदा मुम्बई’ कहने के दिन आ गए । सीने में जलन,
आंखों में तूफान सा क्यों है, इस शहर का हर शख्स परेशान सा क्यो है ?

मुम्बई शहर हादसों का शहर है जहां रोज किसी न किसी के सपनों के साथ कोई न कोई हादसा होता ही रहता हैं।।।

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