Struggler ( उपन्यास ) 16 : सफल एवं श्रेष्ठ जीवन

0
148

भला ऐसा कौन सा व्यक्ति है जिसके मन मे सफल और श्रेष्ठ जीवन जीने की चाहत नही होती है ? ऐसा कौन सा व्यक्ति है जिसके मन में ऐसी अभिलाषा नही जन्म लेती है कि वह अपने जीवन मे कुछ ऐसा करे जिसके करण समाज मे उसकी अलग पहचान बने,
आदर सम्मान मिले एवं उसकी उपलब्धियों पर लोगों को गर्व और गौरव हो।

सफल एवं श्रेष्ठ जीवन
मुक्ता पत्रिका : 1993

किसी भी कर्म को करनेवाले कर्मयोगी या लक्ष्यप्राप्ति के लिए संघर्षरत महत्वाकांक्षी व्यक्तियों के हौसले, उनकी राह-ए-मंजिल में आनेवाले सभी संकटो से टकराने के लिए बुलंद होते है और उनके मन मे एक ऐसी आस होती है कि किसी न किसी तरह किसी भी कीमत पर सफलता उनके कदम चूमेगी… आज नहीं तो कल ।लेकिन क्या सभी की आस पूरी होती है ? क्या सभी के सपने सच होते है ? क्या प्रत्येक महत्वाकांक्षी योद्धा अपने अंदर छिपी संभावना को संभव बनाने में सफल हो पाता है ? नही…नहीं बिल्कुल ऐसा नहीं हो पाता !!! किसी भी क्षेत्र के किसी भी कार्य को करने वाला व्यक्ति शत-प्रतिशत सफल नही होता है ?

जीवन के चाहत की बिसात पर बिछी कर्म और भाग्य की मोहरें कब कैसे कहाँ किसी का पासा पलटकर उसे सफल बना देती है तो किसी को चारों खाने चित करके असफल बना देती है। अपने लक्ष्यसिद्धि के लिए संघर्ष करनेवाला प्रत्येक वयक्ति चाहे वह विद्यार्थी हो, युवा हो, व्यपारी हो, बुद्धिजीवी हो, आध्यात्मिक हो, राजनैतिक हो, सामाजिक एवं सांस्कृतिक किसी भी क्षेत्र से संबंधित या कार्यरत हो,कभी न कभी वह ऐसे दुराहे पर आ खड़ा होता है जब वह “क्या करे ?” ” क्या न करे ?” के पंच परपंच में उलझकर दिग्भ्रमित हो जाता है। किसी ठोस विषय पर उसकी तुरंत निर्णय लेने की क्षमता क्षीण हो जाती है। अपने स्वप्न को सच करने के लिए पल प्रति पल साधना करने वाला साधक कभी कभी दुर्भाग्यवश अपने लक्ष्य से इतना दूर हो जाता है कि उसके बुलंद हौसले पस्त हो जाते है। भविष्य अंधकारमय एवं शून्य प्रतीत होने लगता है। निराश मन मे अकूत विचारो का तूफान आता है, ‘क्या करे’-‘क्या न करे’ उहापोह में अनिर्णय अवस्था मे बोझिल तन मन से इसी तरह निर्थक संघर्ष करता रहे या अपनी वास्तविक परिस्थिति और भाग्य से समझौता कर ले ???

एक तथ्य स्पष्ट है कि किसी भी कार्य मे सफलता आसानी से नही मिलती है। सफलता कोई चमत्कार नही जो किसी तंत्र -मंत्र या टोने-टोटके के द्वारा प्राप्त की जा सके। दान या खैरात के द्वारा भी सफलता नही प्राप्त की जा सकती है। किसी भी कार्य मे पूरी तरह से समर्पित होने के बाद आपकी मनोकुल इच्छा पूरी हो ही जाएगी – ऐसा कोई सनातन ब्रम्ह नियम भी नही है। केवल जीतने की इच्छा लिए खेल खेलनेवाले खिलाड़ी अपनी हार को बर्दाश्त नही कर पाता है। खेल को खेल की भावना के साथ खेलना चाहिए।

मनुष्य परिस्थितयो का दास होता है। अपनी परिस्थिति के अनुकूल अपने आपको परिवर्तित करनेवाले वयक्ति ही समझदारी के साथ, समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चल सकता Bहै। अपनी वास्तविक दयनीय स्थिति को छिपाकर झूठे छल-प्रपंच और दिखावटी जिंदगी जीनेवालो की स्थिति सुबह दोपहर और साँझ की परछाई की तरह घटती और बढ़ती रहती है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here