Struggler (उपन्यास) 4 : compromise

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ई हैं बम्बई नगरिया तू देख बबुआ,
सोने चांदी की डगरिया तू देख बबुआ……………..खैर, अब पहले की बम्बई आज की मुम्बई बन गई हैं।
भारतीय फिल्म के पितामह श्री दादा साहेब फाल्के की फिल्म ” राजा हरिश्चंद्र ” में तारामती का रोल सालुंके नाम के पुरुष ने किया था क्यों कि उस समय कोई लड़की, स्त्री फिल्म में काम करने के लिए तैयार नहीं थी। दादा साहेब फाल्के ने मजबूर होकर एक पुरुष को नारी वेशभूषा में सजाकर तारामती का अभिनय करवाया। यह हिंदुस्तान की पहली फिल्म जन्मोत्सव था जिसने आज शताब्दी से भी अधिक वर्ष का सफर तय करके अपना एक अविस्मरणीय इतिहास बना लिया जिसको पूरा विश्व सराहना की दृष्टि से देखता हैं। एक समय वह था जब लड़कियां फिल्म में काम करना अपमान समझती थी और एक समय आज है कि लाखों लड़कियां मुम्बई में बॉलीवुड की मल्लिका बनने के लिए दिन रात संघर्ष कर रही हैं। दिन का संघर्ष तो ऑडिशन, स्क्रीन टेस्ट, लुक टेस्ट, मीटिंग और शूटिंग में बीत जाता है लेकिन मुम्बई में अपने को टिकाए रखने के लिए, अपने महत्वकांक्षा ख्वाब वाली तितली को पकड़ने के लिए किसी के बिस्तर पर रात को संघर्ष करना पड़ता हैं जिसे बॉलीवुड जबान में कोम्प्रोमाईज़ कहते हैं। ये वक़्त वक़्त की बात है कि कभी लड़कियों ने हिंदुस्तान के पहले फिल्म में काम करने से मना कर दिया और आज ऐसी विडम्बना है कि प्रोड्यूसर्स डायरेक्टर्स के पास सैकड़ों हजारों लड़कियों की चॉइस है और जिसे सक्सेस चाहिए वो एक कदम आगे बढ़कर चॉइस की चॉइस बन जाये और बॉलीवुड में धमाल मचाये लेकिन ऐसा नहीं है कि कोम्प्रोमाईज़ करके ही सफलता मिलती है या ऐसा भी नही है कि जिसने कोम्प्रोमाईज़ नही किया वो लडकिया इंडस्ट्री में नहीं टिक पाई। ऐसा कोई हार्ड एंड फिल्म रूल नहीं है कोम्प्रोमाईज़ के डील को लेकर। यह काम बहुत विश्वसनीय, गोपनीय और आपसी समझदारी के साथ एक दूसरे का वादा पूरा किया जाता हैं लेकिन दुर्भाग्य से 99% लड़कियों को कोम्प्रोमाईज़ के बाद धोखा, वादा खिलाफी ही मिलती है क्योंकि आज के सपनों के सौदागर में वो दम नहीं कि किसी के सपनों का सौदा वो सामने वाली की औकात के हिसाब से कर सके और उनकी अपनी कोई औकात नहीं होती क्योंकि अगर उनकी अपनी औकात होती तो क्या काम की तलाश में आई संघर्षरत लड़की को बहला फुसलाकर झूठे सपने दिखाकर बिस्तर तक ले जाते ???? अपनी हवस की आग ही बुझानी हैं तो मुम्बई में कई अधिकृत कॉल गर्ल्स सेंटर्स है तो फिर अपने पेशे को क्यों बदनाम करना ???? बॉलीवुड को क्यों बदनाम करना ।।।। मर्द वहीं जो अगर कोम्प्रोमाईज़ करें तो अपनी डील को पूरा करें, अगर ऐसा नहीं कर सकता तो यह यौन शोषण है और लड़की के एक पुलिस कंप्लेंट पर वो सलाखों के पीछे जा सकता हैं। मुम्बई नगरी में ऐसी की घटनाएं सुनने देखने को मिलती रहती हैं।
बम्बई से मुंबई के नामकरण………..समय की गति को कोई नहीं जानता। समय सब का गुरु हैं। समय कभी किसी का इंतिजार नहीं करता बल्कि लोग समय का इंतिजार करते हैं। समय सदैव गतिमान रहता हैं। समझदार व्यक्ति वह हैं जो सही समय पर सही काम करें। जिसने समय का सम्मान किया , वह समाज के द्वारा सम्मानित होता हैं। लेकिन जो समय के मोल को नहीं पहचानता , धीरे धीरे उसका अस्तित्व मिट्टी में मिल जाता हैं। ऐसी बहुत सी लड़कियां हैं जो आज सफलता के आसमान को चूम रही हैं लेकिन एक वो भी वक़्त था जब ये लड़कियां मजबूरी में किसी के बिस्तर पर इन्हें कोई और चूमता था कोम्प्रोमाईज़ डील के हिसाब से।।।।।।।। डील सक्सेस हो गई और जिंदगी बदल गयी  । लेकिन ऐसा सब लड़कियों के साथ नहीं होता क्योंकि किस्मत भी तो अपनी इम्पोर्टेंस दिखाती हैं।
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Struggler (उपन्यास) 3 : मायानगरी मुंबई

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Struggler (उपन्यास) 5 : जीवन क्या है ?

 

3 COMMENTS

  1. sir ye mumbai ki story bohat acchi h maine abhi uske 4 page padhe h. sach me dil khush ho gaya sir you are great.

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