Struggler (उपन्यास) 1 : फिल्मी दुनिया की भयानक सच्चाई

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STRUGGLER स्ट्रगलर फिल्मी दुनिया के अंधेरे कोनों को रौशन करनेवाली एक दर्दनाक दास्तान

 

यह उपन्यास फिल्मी दुनिया की कटु सच्चाई है जिसे घटित वास्तविक घटनाओं एवं पात्रों के सहारे बयाँ किया गया हैं जो फिल्मी इंडस्ट्री के सभी स्ट्रगलरों के जिंदगी के किसी न किसी पहलू को छूती हैं। स्ट्रगलरों के साथ होने वाले शोषण, खासकर लड़कियों के साथ कोम्प्रोमाईज़ का डील करनेवाले लोगों को इस उपन्यास से जरूर तकलीफ होगी क्योंकि हमाम में सभी नँगे होते है लेकिन ऐसे लोग खुले समाज मे भी कच्छी चड्ढी पहनकर घूमते रहते हैं। यदि मेरे इस रचना से ऐसे लोगों को कोई तकलीफ होती हैं तो मैं हृदय से आनंदित होऊंगा और उनके मानमर्दन के लिए किसी भी प्रकार की क्षमा नहीं मांगूंगा। मेरे इस उपन्यास का उद्देश्य भारत के दूर दराज गांव, मुंबई से दूर दराज शहर एवं कस्बों से हीरो-हिरोइन बनने के लिए मुम्बई आने वाली भीड़ को बॉलीवुड की कठिनाइयों से रु-ब-रु कराने का प्रयास हैं ।

यूपी, बिहार,झारखंड,छतीसगढ़,उत्तराखंड,पंजाब एवं बंगाल के अलावा कई राज्यों के उन गांवों में जहां आज़ादी के इतने सालों बाद भी बिजली नही पहुँची हैं, ऐसे गाँव के जवान लड़के लड़कियां अपनी आंखों में film , सीरियल हीरो हीरोइन बनने का सपना लेकर मुम्बई की सड़कों पर अपनी जूती, जूते कम बल्कि एड़ियां घिसनेवाले स्ट्रग्लेरों की संघर्ष गाथा हैं ये उपन्यास

 

गोल्डन लाइफ की चकाचौध से गुमराह हो अपनी सेक्सी बॉडी के रास्ते शार्ट कट सक्सेस रास्ते तलाशती लड़कियों की इमोशनल अत्याचार की कहानी है ये उपन्यास स्ट्रगलर

शून्य से उठकर शिखर पर सफलता का परचम लहरानेवालों, जीरो से हीरो बनने वालों, फर्श से अर्श तक उड़नेवाले उम्मीदों की तितलियां पकडनेवालों, पीछे न मुड़ने की टेक में जिल्लत की जिंदगी का एक एक दिन काटनेवालों के संघर्षमय जीवन की सनसनीखेज सच्चाई  पेश करती है ये उपन्यास

शिखर, स्वामी, विशाल, बिहारी, और अब्दुल ये तो सिर्फ कुछ नाम है पर इनके सपनों से मिलते-जुलते सपने लिए मुम्बई आनेवालों की संख्या काफी हैं क्योंकि मुंबई सपनों का शहर हैं। स्ट्रगल तो हर किसी को करना पड़ता हैं । कुछ लोग भरे पेट संघर्ष करते हैं तो कुछ लोग खाली पेट……..
लेकिन एक बात पक्की हैं कि स्ट्रगल के दिनों में बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं। भयंकर असहनीय पीड़ा भोगनी पड़ती हैं। सामाजिक उपहास को झेलना पड़ता हैं। फिल्मी दुनिया बॉलीवुड में असफलता का कड़वा घूंट पीकर लौटा स्ट्रगलर और सरहद से पीठ पर गोलियां खाकर भाग आया फौजी, इन दोनों की समाज गांव में कोई इज़्ज़त नहीं होती। ऐसे स्त्रगलर और फौजी ……दोनों जीते जी अपने आप अपने नाम पर गाली बन जाते हैं जो उनके आस पास रहने वाले लोग किसी और को उलाहना देने के लिए इनका नाम लेकर , इनकी असफलता पर बनी गालियों का खूब इस्तेमाल करते हैं।

मुम्बईयाँ फिल्म इंडस्ट्री में स्ट्रगल करनेवाला हर स्ट्रगलर चाहे वह लड़का हो या लड़की, सभी स्ट्रगलर हीरो या हीरोइन नहीं बन पाते हैं। फिर सपनों को जिंदा रखने के लिए जुगाड़ करना पड़ता हैं। सपनें कही आत्महत्या न कर ले इसलिए खुद को जिंदा रखने के लिए रोज ब रोज आत्महत्या करना पड़ता हैं ऐसे स्ट्रगलरों को । वाह ।। खुद को जिंदा रखने के लिए आत्महत्या करने पड़े ये जुमला तो बहुत ही भारी हैं। अगर ऐसे स्ट्रगलर लड़के हीरो नहीं बन पाते तो कोई लेखक बन जाता है, कोई कैमरा मैन, कोई किसी का सेक्रेटरी/ पी आर ओ बन जाता है तो कोई किसी का मेकअप मैन । कोई जूनियर आर्टिस्ट सप्लाई करने का धंधा करता हैं तो कोई करैक्टर आर्टिस्ट सप्लाई करने के नाम पर लड़कियां सप्लाई करने का गोरखधंधा । यदि वो स्ट्रगलर लड़की हैं तो उसके सामने भी पचासों रास्ते होते है लाइफ सर्वाइवल के। कुछ अच्छे कुछ बुरे। कुछ ठीक ठाक तो कुछ बिल्कुल ही टेढ़े मेढ़े ।

जीवन का दूसरा नाम संघर्ष STRUGGLE हैं। बॉलीवुड……….मुम्बई के फिल्मी दुनिया का संघर्ष केवल जीवट व्यक्ति ही झेल सकता हैं। फिल्मों में कुछ कर दिखाने के लिए जो संघर्ष करना पड़ता हैं उसमें ऐरे-गैरे नत्थू-खैरे कुछ दिन, कुछ महीने या कुछ वर्ष में अपनी हैसियत,औकात समझकर इस सुलेमानी कीड़े की दंश से दूर हो जाते हैं या मुम्बई छोड़कर भाग जाते हैं। मैदान में रह जाते हैं कुछ स्ट्रगलर जो या तो अपना नाम कर जाते है या तो हमेशा हमेशा के लिए गुमनाम हो जाते हैं।

क्या आपने कभी यह सोचा कि अगर मुम्बई शहर से फिल्मी हलचल को अलग कर दिया जाए तो क्या होगा ????? सपनों की नगरी मुम्बई का चार्म ही खत्म हो जाएगा । देश की आर्थिक राजधानी मुम्बई एक क्षण में बेजान बेरंग हो जाएगी। मुम्बई का लोक सागर, उस पर उतराता उम्मीदों का गागर, कोई पार लग गया तो कोई मंझधार में डूब गया। ये पार उतरने या मंझधार में डूबने के किस्मती खेल बहुत ही रोमांचक एवं आकर्षक होता हैं। खैर……..डूबना या पार लगना, यह तो किस्मत की बात है लेकिन आगे बढ़ने के लिए मरते दम तक अथक प्रयास करना ही ” स्ट्रगलर ” का धर्म होता हैं ।

न हो तू निराश
न कर मन को उदास ।

न हो तू निराश
निराशा तुझे कर देगी
शून्य जीवन से हताश ।

न कर मन को उदास
उदासी छीन लेगी
तड़पते मन की आस ।

न हो तू निराश
न कर मन को उदास ।

अपने विह्वल मन में जगा
विश्वास की एक आस………….

आज की शाम
तू क्यों रात भर और
जीने से डरता हैं ………….
क्या पता !!!
कहीँ ऐसा हो जाये,
कल सुबह…………..
तू इस सूरज को रौशन कर दें !!!!

न हो तू निराश
न कर मन को उदास ।
…………………………….

 

Read next part :-

Struggler (उपन्यास) 2 : जीवन एक संघर्ष

Struggler (उपन्यास) 3 : मायानगरी मुंबई

4 COMMENTS

  1. This is very beautyful nd knowledgeable message for every struggler.
    thanks for information sir
    thank you so much 😊

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